संविधान निर्माता के प्रश्न पर एक विचार :
https://www.khabaronline.top/news_week.php?view=69e33ffc0d55a
“सही जानकारी का प्रसार होना चाहिए” —
इसी उद्देश्य के साथ यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या भारतीय संविधान के निर्माण को केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित करना उचित है?
इतिहास के अनुसार, बाल गंगाधर तिलक ने 1895 में “स्वराज बिल” के माध्यम से भारत के लिए एक प्रारंभिक संवैधानिक ढांचा प्रस्तुत किया, जिसमें लगभग 113 अनुच्छेद बताए जाते हैं। यह भारत में संवैधानिक सोच की एक प्रारंभिक पहल मानी जाती है।
इसके बाद एम. एन. रॉय ने 1928 और 1944 में संवैधानिक विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जिसमें लगभग 13 अध्याय और 137 अनुच्छेदों का उल्लेख मिलता है। ..... ..... .......
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“सही जानकारी का प्रसार होना चाहिए” —
इसी उद्देश्य के साथ यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या भारतीय संविधान के निर्माण को केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित करना उचित है?
इतिहास के अनुसार, बाल गंगाधर तिलक ने 1895 में “स्वराज बिल” के माध्यम से भारत के लिए एक प्रारंभिक संवैधानिक ढांचा प्रस्तुत किया, जिसमें लगभग 113 अनुच्छेद बताए जाते हैं। यह भारत में संवैधानिक सोच की एक प्रारंभिक पहल मानी जाती है।
इसके बाद एम. एन. रॉय ने 1928 और 1944 में संवैधानिक विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जिसमें लगभग 13 अध्याय और 137 अनुच्छेदों का उल्लेख मिलता है। ..... ..... .......
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“सही जानकारी का प्रसार होना चाहिए” —
इसी उद्देश्य के साथ यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या भारतीय संविधान के निर्माण को केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित करना उचित है?
इतिहास के अनुसार, बाल गंगाधर तिलक ने 1895 में “स्वराज बिल” के माध्यम से भारत के लिए एक प्रारंभिक संवैधानिक ढांचा प्रस्तुत किया, जिसमें लगभग 113 अनुच्छेद बताए जाते हैं। यह भारत में संवैधानिक सोच की एक प्रारंभिक पहल मानी जाती है।
इसके बाद एम. एन. रॉय ने 1928 और 1944 में संवैधानिक विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जिसमें लगभग 13 अध्याय और 137 अनुच्छेदों का उल्लेख मिलता है। ..... ..... .......
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इसी उद्देश्य के साथ यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या भारतीय संविधान के निर्माण को केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित करना उचित है?
इतिहास के अनुसार, बाल गंगाधर तिलक ने 1895 में “स्वराज बिल” के माध्यम से भारत के लिए एक प्रारंभिक संवैधानिक ढांचा प्रस्तुत किया, जिसमें लगभग 113 अनुच्छेद बताए जाते हैं। यह भारत में संवैधानिक सोच की एक प्रारंभिक पहल मानी जाती है।
इसके बाद एम. एन. रॉय ने 1928 और 1944 में संवैधानिक विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जिसमें लगभग 13 अध्याय और 137 अनुच्छेदों का उल्लेख मिलता है। ..... ..... .......
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